माननीय अध्यक्ष महोदय का संदेश......

स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर मैं आज उन्हें सादर नमन करता हूँ। स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व जितना ही पारदर्शी रहा है उतना ही विराट रहा है । उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ लिखना सूरज को दीपक दिखाने के समान है लेकिन उनकी जयंती के शुभ अवसर पर मेरे मन की श्रद्धा दो-चार पंक्तियाँ लिखने के लिये मुझे विवश कर रही है।
कितना अच्छा और सार्थक नाम दिया नरेंद्र को गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस ने । उन्हें नर के इंद्र अर्थात राजा से सीधे विवेक के आनंद में डूबे रहने का आशीर्वाद दिया क्योंकि गुरुदेव जानते थे इंद्र या राजा के पद में मद है जबकि विवेक यानी ज्ञान का पद परम पद है । इसी परम पद को स्वामी विवेकानंद ने न सिर्फ प्राप्त किया बल्कि पूरी दुनिया को अपने जीवन काल तक उस ज्ञान का दान अनवरत रूप से करते रहे ।
सनातन धर्म के लोच को स्वामीजी ने अपने आचरण में अपनाया । यही कारण है कि शिकागो की धर्मसभा में विश्वबंधुत्व का संदेश देते हुए उन्होंने उस सभा को मेरे अमेरिकी भाई-बहनो कहकर संबोधित किया। विश्वबंधुत्व की यह अद्भुत अवधारणा सनातन धर्म में है ।
स्वामीजी ने सनातन धर्म की इस विशेषता को आत्मसात किया कि यह किसी पर थोपा नहीं जाता बल्कि इसकी मूल अवधारणा है अपने आपको जानो ।
स्वामीजी का जीवनकाल मात्र 39 वर्ष का रहा लेकिन उन्होंने इसी अल्पावधि में ऐसा काम किया जो सौ वर्ष जीने वाले भी लोग नहीं कर पाते हैं । उन्होंने समाज को यह दिखाया कि महत्व आयु नहीं रखती बल्कि व्यक्ति के द्वारा किये गये काम महत्व रखते हैं ।
स्वामी विवेकानंद की विशेषताओं में एक यह भी रही कि उनमें नकारात्मकता बिल्कुल नहीं रही । वे सदैव सकारात्मक सोचते रहे और अपनी सोच को आम जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने परिव्राजक के रूप में भारत सहित पूरी दुनिया में भ्रमण किया । सनातन धर्म की आध्यात्मिक शक्ति से दुनिया को परिचित कराने के लिये ही वे संन्यासी होकर भ्रमण करते रहे । स्वामीजी का नियंत्रण अपनी हर साँस पर था तभी उन्होंने अपनी मृत्यु को स्वयं अंगीकार किया और ध्यानावस्था में ही उन्होंने महासमाधि ली । यह भारत की विशेषता है कि जहाँ बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं को लोग झुठला देते हैं वहाँ एक संन्यासी को आज भी अपने मन में बसाये हुये हैं । यही स्वामीजी के प्रति देश की सच्ची श्रद्धा है ।
स्वामीजी ने 19वीं शताब्दी में 21वीं शताब्दी के भविष्य की जो भविष्यवाणी की थी अब वह सफलीभूत हो रही है ।
स्वामीजी के सम्मान में 12 जनवरी को युवा दिवस मनाया जाता है । युवा दो अक्षरों से बना है - यु और वा । हम दोनों को देखें तो यु से युग और वा से वाहक बनता है । युवा ही युग के वाहक हैं और 21वीं सदी की नींव, रीढ़ और मस्तिष्क हैं । युवा अपने कौशल और हुनर से आगे बढ़ेगा । यही युवा आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करेगा और भारत विश्वगुरु बनेगा ।
स्वामी विवेकानंद हम लोगों के आदर्श हैं, मार्गदर्शक हैं और सदैव हमारे प्रेरणास्रोत बने रहेंगे । उनकी जयंती के अवसर पर मैं अपनी तथा बिहार विधान सभा की ओर से सादर नमन करते हुए उनके प्रति विनम्र श्रद्धा व्यक्त करता हूँ ।


Shri Vijay Kumar Sinha,
Hon'ble Speaker, Bihar Vidhan Sabha